लखनऊ : उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार के सामने कड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी चुनाव नहीं कराए जाने पर अदालत ने स्पष्ट कहा है कि चुनाव कराना केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि संवैधानिक और वैधानिक जिम्मेदारी है। अदालत ने सरकार से पूछा है कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां थीं, जिनके कारण समय पर चुनाव नहीं कराए जा सके।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी होने के छह महीने के भीतर चुनाव संपन्न कराना राज्य सरकार की वैधानिक बाध्यता है और इस प्रक्रिया की समयसीमा नवंबर 2026 में पूरी हो रही है। अदालत ने यह भी कहा कि भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए चुनाव की तैयारियां मौजूदा पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने से कम से कम दो वर्ष पहले शुरू कर देनी चाहिए।
अदालत ने सरकार से पूछा- आखिर देरी क्यों?
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याचिका एस.के. शर्मा की ओर से दाखिल की गई है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि राज्य सरकार स्वयं यह कह रही है कि पंचायत चुनाव की प्रक्रिया मई 2025 से शुरू कर दी गई थी। यदि ऐसा था, तो फिर अब तक चुनाव क्यों नहीं हो सके?
पीठ ने कहा कि अदालत यह जानना चाहती है कि क्या चुनाव में देरी के पीछे वास्तव में ऐसी परिस्थितियां थीं, जो सरकार के नियंत्रण से बाहर थीं, या फिर सरकार अपने संवैधानिक दायित्व को पूरा करने में विफल रही। हाईकोर्ट ने सरकार को सुप्रीम कोर्ट के ‘सुरेश महाजन’ मामले में दिए गए फैसले का भी अध्ययन करने की सलाह दी और कहा कि यह निर्णय पंचायत चुनावों के समयबद्ध आयोजन के संबंध में महत्वपूर्ण है। मामले की अगली सुनवाई 11 अगस्त 2026 को होगी। तब तक अदालत सरकार द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों और रिकॉर्ड का पुनः परीक्षण करेगी।
प्रयागराज पीठ में सरकार ने क्या कहा?
इधर, इलाहाबाद हाईकोर्ट की प्रयागराज पीठ में भी पंचायत चुनाव में देरी को लेकर सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ के समक्ष राज्य सरकार ने अपना विस्तृत जवाब दाखिल किया। सरकार ने चुनाव टलने के पीछे दो प्रमुख कारण बताए हैं।
1. ओबीसी आरक्षण प्रक्रिया
सरकार का कहना है कि पंचायत चुनाव में पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण तय करने के लिए उत्तर प्रदेश राज्य स्थानीय निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया। आयोग की रिपोर्ट और उसकी सिफारिशों के आधार पर ही आरक्षण का निर्धारण किया जाना था। इस पूरी प्रक्रिया में समय लगने के कारण चुनाव निर्धारित समय पर नहीं कराए जा सके।
2. मतदाता सूची तैयार होने में देरी
सरकार ने यह भी बताया कि राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन की तिथि 10 जून 2026 निर्धारित की गई थी। ऐसे में 26 मई 2026 से पहले पंचायत चुनाव कराना संभव नहीं था।
प्रशासकों की नियुक्ति पर भी सवाल
याचिकाकर्ताओं ने अदालत में यह भी दलील दी कि पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद निर्वाचित प्रतिनिधियों की जगह प्रशासकों की नियुक्ति करना संविधान की भावना के विपरीत है। याचिका में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-ए) के तहत प्रशासक नियुक्त किए गए हैं, लेकिन यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 243-ई, जिसमें पंचायतों के नियमित और समयबद्ध चुनाव का प्रावधान है, की मूल भावना के अनुरूप नहीं है। प्रयागराज पीठ ने सरकार के जवाब पर याचिकाकर्ताओं को बिंदुवार प्रतिवाद दाखिल करने का समय दिया है। इस मामले में भी अगले सप्ताह सुनवाई होगी।
क्या नवंबर 2026 तक होंगे चुनाव?
फिलहाल हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद यह स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि सरकार पर पंचायत चुनाव जल्द कराने का दबाव बढ़ गया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि अधिसूचना जारी होने के बाद छह महीने के भीतर चुनाव कराना राज्य सरकार की कानूनी जिम्मेदारी है और इसकी समयसीमा नवंबर 2026 में समाप्त हो रही है। अब सभी की निगाहें 11 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं। यदि अदालत सरकार के जवाब से संतुष्ट नहीं होती, तो पंचायत चुनावों को लेकर और सख्त निर्देश भी जारी किए जा सकते हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश के लाखों ग्रामीण मतदाताओं और पंचायत प्रतिनिधियों के लिए आने वाले दिन बेहद अहम साबित हो सकते हैं।

